थप्पड़ (Slap) एक २०२० में बनी भारतीय हिंदी भाषा की ड्रामा फिल्म है, जिसका निर्देशन अनुभव सिन्हा ने किया है और इसका निर्माण खुद अनुभव सिन्हा और टी-सीरीज़ – भूषण कुमार ने किया है। तापसी पन्नू अभिनीत फिल्म 28 फरवरी 2020 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई थी।
फिल्म के शुरुआत से ही फिल्म कहानी के विषय पर पकड बनाने हेतू फिल्माए गए शुरुआती दृश्य निर्देशक अनुभव सिन्हा की विषय के प्रती परिपक्वता को दर्शाता है| फिल्म कही पर भी अपने मुक्ख्य विषय से हटते दिखाई नही देती है| फिल्म केवल मनोरंजन हेतू देखने वाले दर्शको के लिए कतई नही है| यह फिल्म उन श्रोतागण के लिए जो फिल्म को सिर्फ देखना नही बल्की समझना और महसूस करना चाहते जानते है| सिनेमा समीक्षक का इरादा दर्शको को श्रेणीबद्ध करने का कतई नही है… सिनेमा समीक्षक सिर्फ फिल्म के स्वरूप को आपके सामने रखना चाहता है| फिल्म के टायटल से आपको यह गलतफैमी हो सकती है के यह फिल्म एक घरेलू हिंसा पर आधारीत फिल्म है, लेकीन यह फिल्म उस पुरुष प्रधान सोंच कि ओर इशारा करती है जो की सदियो से परंपरा बनकर चली आ रही है| अगर अब तक का लेख पढने के बाद आपको आपको यह लग राहा है के फिल्म मे झरूर नारी शक्ती के बारे मे कहा गया होगा तो दोस्तो बता दे… की फिल्म मे ऐसा कूच नही है, तो फिर आप सोच रहे होंगे कि फिल्म मे ऐसा क्या है जो हमे पता नही है या हम समझ नही पा रहे है, दोस्तो फिल्म मे यही बात है जो (हम यहा सिर्फ पुरुषो की बात नही हो रही है, हम मतलब दोनों स्त्री और पुरुष) या तो समझना नही चाहते या फिर नझर अंदाज कर देते है| हम कहाणी को विस्तार मे बता के फिल्म देखने का दर्शको उत्साह कम नही करना चाहते है| इसलिये कहानी के विषय को जो के एक गंभीर विषय है समझने के लिए उसे एकबार झरूर देखें यह फिल्म अब अमेझन प्राईम वेबएप पर उपलब्ध है, संक्षिप्त मे बात दे कि यह फिल्म स्त्रियो के प्रती समाज (स्त्री, पुरुष दोनो) की एक सोच पर आधारित है जिसपर आज भी इक्कीसवी सदि में समाज यकीन रखता है|
आईए अब रुख करते है फिल्म कि तरफ…
टायटल : थप्पड़
के द्वारा प्रस्तुत : भूषण कुमार, क्रिशन कुमार, अनुभव सिन्हा
निर्देशक : अनुभव सिन्हा
लेखक : अनुभव सिन्हा, मृण्मयी लागू
जेनर : फैमिली ड्रामा
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फिल्म कूछ इस तरह आगे बढती है| जैसा के हमने पहले हि स्पष्ट कर दिया था के फिल्म के शुरुआत से ही फिल्म के विषय के इर्द गिर्द घुमती दिखाई देती है लेखक एवं निर्देशक ने फिल्म को अपने विषय से अंत तक हटने नही दिया| अमृता उर्फ अम्मू (तापसी पन्नू) और विक्रम (पावेल गुलाटी) दोनो कई सालों से अपनी शादीशुदा झिंदगी खुशी-खुशी बिता रहे है। विक्रम जो के अपने लक्ष के प्रती बहुतही महत्त्वाकांक्षी है, और अपने लक्ष को पाने के लिए दिन रात मेहनत करता है| उसका लक्ष है के वह अपने कंपनी में तरक्की लेकर कंपनी के लंदन स्तिथ कार्यालय का भार मुक्ख्य प्रतिनिधी रूप मे संभाले सबकुछ सही जा राहा होता है, दुसरी ओर अमृता उर्फ अम्मू जो कि विक्रम कि धर्मपत्नी का किरदार निभा रही है, वह विक्रम के इस सपने का समर्थन करती है और पत्नी के रूप में पुरी तरह से उसको सहयोग करते नझर आती है| अम्मू विक्रम कि दुनिया को पुरी तरह से अपनी दुनिया मान चुकी है| कहानी कि शुरुआत ही लंदन जाने के संवाद से शुरू होती है, विक्रम प्रेसेन्टेशन की तयारी मे दिन रात लगे रेह्त्ते है, जीससे वह कंपनी मिटिंग मे अपने उच्चस्तरीय अफसरो का दिल जीतकर कंपनीद्वारा लंदन भेजे जाने के लिए पात्र हो जाए, और उसकी मेहनत रंग लाती है विक्रम को लंदन कार्यालय के लिए हरी झंडी मिल जाती है| जिसकी ख़ुशी मे विक्रम उसी दिन घर पर एक पार्टी का आयोजन करते है| पार्टी मे सगे संबंधी अडोस पडोस के लोग और ऑफिस के कूछ मुक्ख्य अधिकारी भी आते है| सबकूछ बोहोत अच्छा चल रहा होता है उसीबीच पार्टी दौरान विक्रम को बधाई देने हेतू कंपनी के उच्चस्तरीय अफसर का फोन आता है| बधाई देते देते वह बताना नही चुकते कि लंदन मे उन्हे मुक्ख्य प्रतिनिधी बनकर नही तो किसी फोरेनर के मार्गदर्शन में काम करना है| और फिर विक्रम अपना आपा खो देते है और पार्टी मे मौजूद उनके सहायक कर्मचारी जो के गार्डन एरिया मे जो के घर के एक कोने मे है, वहा जाकर उनसे जवाब पुछने लगते है, (अंदर हॉल मे लोग गानो पर थिरक रहे होते है) और कहासुनी दौरण विक्रम बेकाबू होने लगते है| मामले को बढता देख उन्हे रोकने के लिए हॉल से होते उए उनकी पत्नी अमृता बाहर आती है, और विक्रम को रोकने कि कोशिश करती है| इसी बीच विक्रम गुस्स्मे मे पलटकर अपनी ही पत्नी यानी अमृता को एक जोरदार थप्पड जड देते है| जिसे वहा खडे कूछ चुनिंदा लोग देखते है, अंदर होल मे लोग अब भी गानो पर थिरक रहे है, अमृता के मात पिता इस दृश्य को देखते है, अमृता कुछ देर के लीए सुन्न हो जाती है| उसे यह वाकया अंदर तक झन्झोर कर रख देता है| घर के सभी लोग निराश और गंभीर हो जाते है| निर्देशक इस सीन पर झरुरत से ज्यादा जोर देते नही दिखाई दिए पर उसकी गंभीरता को दर्शाने से भी नही चुके है| हम ऐसा कह रहे है इसका कारण है के फिल्म के इस दृश्य का फिल्माए जाने का संतुलित तरीका जो के बहुत वास्तविक लगता है जो हमने आपके सामने विस्तार मे पेश करने की कोशिश कि है|
इस घटना के बाद अमृता मे आगले ही दिन से काफी बदलाव नझर आने लागता है| वह इस घटना को समज नही पा रही होती है या फिर समजने कि कोशिश कर रही होती है| घरमे तणाव का माहोल होता है| लेकीन अम्मू ब भी रोज मर्रा की झीन्द्गी मे कोई बदलाव आने नही देती है बस उसके चेहरे कि ख़ुशी कही गुम सी हो जाती है| विक्रम अगले दिन उसे समझाता है, ऐसा क्यू हुआ और वह जोब उसके लीए कितनी महत्त्वपूर्ण थी| जैसे जैसे विक्रम अमृता को समझाने कि कोशिश करता है वैसे वैसे अमृता और गहरी सोच मे पडणे लगती है| और उसकी यह नाराझगी और बंढने लगती है और वह कूछ दिनो के लिए अपने मता पिता के पास जाने का फैसला करती है जो के विक्रम को रास नही आता और विक्रम को लागता है के अम्मू बात का बतंगगड बना रही है| आखिर मे विक्रम के मना करने के बावजुद अम्मू अपने माता पिता के घर चली जाती है| और फिर आगे बोहोत कुछ ऐसा होता है जोके शादीशुदा जोडे के बीच नही होना चाहिए… कहानी को फिल्म मे बहुतही सीधे, सरल लेकीन संजीदगी से दिखाया गया है| आप सिर्फ मनोरंजन हेतू फिल्म को देखना चाहते हो तो शायद आपको थोडीसी निराशा हो सकती है… पर अगर आप इस फिल्म को फिल्म कि तरह देखे तो आपको यह फिल्म भा जायेगी…
सभी कलाकारो ने अपनी भूमिका को बखुबी निभाया है| तापसी पन्नू समेत कुमुद मिश्रा, रत्ना पाठक शहा, तन्वी आझमी अपने नाम स्वरूप सहज एवं नैसर्गिक अभिनय करते नझर आए साथ हि मे राम कपूर और मानव कौल ने भी अपना किरदार सफाई से निभाया है| गीतिका विद्या ने सुनिता (नौकरानी) के किरदार मे मानो जान फुंक दी है| वकील के रूप मे नझर आती माया सराव किरदार को निभाते हुए संवादो मे कही कही कम झ्यादा लग सकती है| कुल मिलाकर सिनेमा समीक्षक कि माने तो “थप्पड” एक बहुतही बढीया फिल्म है, जो समाज कि एक पारंपारिक सोच को सिरे से खारीज करती है|
हम सभी को यह फिल्म कम से कम एकबार देखनी ही चाहिए|
ट्रेलर देखे…

