गणवेश (Uniform | वर्दी ) यह फिल्म अतुल जगदाले द्वारा निर्देशित मराठी भाषिक फिल्म है, ईस फिल्म का निर्माण विजयते एन्टरटेनमेंट बैनर तले राजेंद्र कुलकर्णी, शैलेंद्र घाडगे और इरॉस इंटरनेशनल ने किया है| यह फिल्म २४ जून २०१६ को सिनेमाघरो में प्रदर्शित हुई थी| फिल्म सामाजिक व्यवस्था, आर्थिक दुर्बलता, गणवेश (Uniform) याने वर्दी का अलग अलग द्रीष्टीकोनसे महत्व, और उसके सम्मान की कहानी है| फिल्म वर्दी के कई रूपो को रेखांकित करती और उससे जुडे विभिन्न पहलूओ पर एक साथ भाष्य करती है| फिल्म में मुख्य कलाकार के रूप में किशोर कदम, मुक्ता बर्वे, दिलीप प्रभावालकर, स्मिता तांबे और तन्मय मांडे मुख्य भूमिका में है और नागेश भोसले, गुरु ठाकुर, सुहास पलशीकर, शरद पोंक्षे, गणेश यादव सहायक कलाकार के रूप में देखने मिल सकते है| फिल्म की पुरी स्टार कास्ट मंझे हुए कलाकारो से भरी हुई है|
आईए अब रुख करते है फिल्म की कहानी की तरफ…
निर्देशन : अतुल जगदाले
निर्मिता : राजेंद्र कुलकर्णी, शैलेंद्र घाडगे (विजयते एन्टरटेनमेंट), इरॉस इंटरनेशनल
कथा, पटकथा, संवाद : तेजस घाडगे
जेनर (शैली) : ड्रामा (सामाजिक)
कहानी
यह कहानी है मधुकर सुरेश उन्हाले उर्फ “मध्या” (तन्मय मांडे) और उनके परीवार की जो के एक छोटेसे गावं की पाठशाला में चौथी कक्ष में पढणे वाला छात्र है| मध्या पढाई में अव्वल आने वाले विद्यार्थीयो मेसे एक है इसिलिए बाकी कूछ होशियार बच्चो के साथ मध्या को भी भारत के ६८ वे स्वतंत्र दिवस के पाठशाला के कार्यक्रम में भाषण देणे हेतू चुना जाता है, साथ ही में स्वतंत्र दिवस के अवसर पर राज्य के शिक्षणमंत्री श्री. देशमुख सर (दिलीप प्रभावालकर) जी की उपस्थिती में भाषण देना है इसिलिए उन्हे नए गणवेश (School Uniform) पहनने की सूचना दि जाती है| मधुकर पढाई में अव्वल होणे के साथ साथ आत्मविश्वास से भरा हुवा विद्यार्थी है, परंतु उसके घरकी आर्थिक परीस्थिती बहुतही निचले स्तर की है बहुतही मर्यादित संसादनो के साथ वह गुजर बसर कर पा रहे होते है काफी अरसे से उन्होने मधुकर के लिए नया गणवेश (School Uniform) भी नही खरीदा है, ऐसे में मधुकर को पाठशाला में उसके छोटे कपडो के कारण सारे बच्चे एक विशेष नाम से चीढाने भी लगे है| ईन सब के बीच मधुकर भाषण देणे हेतू चुने जाने पर बहुत खुश है, और वह अपनी ख़ुशी अपने म पिता के सामने जाहीर करता है, साथ ही में “मध्या” नए गणवेश की बात बताने से नही चुकता जिसके बाद उसकी मां छाया उसें पैसो की कमी के चलते तुरंत मना कर देती है| मधुकर जो स्वतंत्र दिवस में अपने भाषण के सपने सजाये बैठा है वह अपने मां द्वारा गणवेश(School Uniform) मना करने पर मायुस हो जाता है, और फिर उसके पिता जो मुक्ख्य किरदार में है सुरेश दिनकर उन्हाले उर्फ सूर्या (किशोर कदम), जो पत्नी के मना करने के बावजूद अपने बेटे की ख़ुशी के खातीर बेटे (मध्या) को दो दिन में नया गणवेश (School Uniform) लाने का वादा करते है|
दुसरी ओर मीरा पाटील (मुक्ता बर्वे) जो के पुलिस इंस्पेक्टर कि भूमिका में है और मुख्य किरदारो कि कडी में से एक है| वह स्वतंत्र दिवस के अवसर पर नए गणवेश(पुलिस वर्दी) में परेड कर भारत के झंडे को सलामी स्वरूप मानवंदना देने के लीए उत्सुक है| मिरा पाटील की ड्युटी उसी शहर के थाने में है जो शहर सूर्या याने सुरेश उन्हाले, “मध्या” के पिता के गावं के पास है| मिरा पाटील एक कर्तव्य दक्ष पुलिस अफसर है जो अपने कर्तव्य के आगे कसी भी प्रकार का समझौता नही करती| मिरा पाटील की ड्युटी जिस थाने में लगी है, हालही में वहा आसपास के इलाके में डकैती का प्रमाण हद से ज्यादा बढ चुका है| कुछ सामाजिक तत्व अपने राजनीतिक स्वार्थ के चलते पुलिस को बदनाम करने का एक भी मौका नही छोडते है, उपर से कारवाही करे तो भ्रष्ट सिनिअर्स का दबाव आता है| इन सभी अडचणो और मानसिक तणाव के बीच मीरा पाटील डकैतीओ के सिलसिले कि भी जाचं कर रही होती है|
इस कहानी का और एक एंगल है जो के शिक्षण मंत्री “देशमुख सर” (दिलीप प्रभावालकर) के रूप में उभर कर आता है| वह एक इमानदार मंत्री का किरदार निभा रहे है| दिलीप प्रभावालकरजी के अभिनय का आनंद हमने मराठी तथा हिंदी फिल्मो में लिया है, राजकुमार हिराणी निर्देशित “लगे रहो मुंन्नाभाई” इस हिंदी भाषिक फिल्म में गांधीजी का किरदार निभाने वाले दिग्गज अभिनेता दिलीप प्रभावालकर हिंदी तथा मराठी इंडस्ट्री में अपने बेहतरीन अभिनय के लिये जाने जाते है| शिक्षण मंत्री देशमुख सर (दिलीप प्रभावालकर) को उन्होने जिस स्कूल में शिक्षण लिया था उस स्कूल के विद्यार्थियो से प्रती विद्यार्थी १ रुपया जमा कर खादी का कपडा स्वतंत्र दिवस के मद्देनझर भेंट स्वरूप दिया जाता है| और एक इमानदार और स्वच्छ छवी के शिक्षण मंत्री याने देशमुख सर कि यह इच्छा होती है के वह ईस भेंट में मिली खादी से स्वतंत्र दिवस के लीए अपनी मंत्री स्वरूप वर्दी सिलवाये और वह ऐसा करते भी है|
सूर्या जो के अपने बेटे का गणवेश खरीदने और सिलवाने कि हर संभव कोशिश कर चुका है और किसी न किसी अनहोनी की वजह से वह नाकायाब हो चुका है, वह अपने पुत्र प्रेम और उसकी ख़ुशी के लिए अपराध करने पर मजबूर हो जाता है यह कहानी पुत्र प्रेम के आगे जाकर कई विषयो पर एक साथ भाष्य करती नझर आती है| गणवेश याने वर्दी याने Uniform के असली मायने क्या होते है, इस पर भी आपको सोचने पर मजबूर करती है| साथ ही में समाज व्यवस्था, देश प्रेम, राजनीती और कई ऐसे मुद्दो को एक साथ छुं जाती है|
निर्देशन
निर्देशन कि अगर की अगर बात करे तो निर्देशक अतुल जगदाले की जितनी तारीफ कि जाए उतनी कम है| फिल्माए गए दृश्यो में कई ऐसे द्रष्य है जो के विडंबनात्मक रूप से विषयो पर भाष्य करते है| जैसे सूर्या का गांव के राजनीती में पैर जमाने कि कोशिश मी लगे नेता के पास जाना जहा नेता स्वतंत्र दिवस का शुभेछाये देणे वाला बोर्ड पेंट करवा रहा होता है जिसमे रंगो को लेकर विडंबनात्मक रूप से चुटकी लेना उसी समय वहा खडे सूर्या की परीस्ठीथी का दर्शन होना यह तथाकथित संमृद्ध भारत कि छवी दर्शाने वाले राजनेताओ को सिख देने वाला दृश्य है| सूर्या का पैसो के लीए प्रदर्शन में भाग लेना पुलिस द्वारा पकडे जाणा और वहा से भगा दिया जाना जिसमे सूर्या को इतनी जद्दोजहद के बाद कूछ हासील न होना उसकी आर्थिक परीस्ठीथी का दर्शन करवाता है| एक ही फ्रेम में कहाणी के कई अंगो को छु जाना यह निर्देशक की खूबी यहा झलकती है फिल्म में कई ऐसे दृश्य है जो आपको अंतर्मुख कर सकते है, आपको भावूक कर सकते है, और साथ ही में आपको मंत्रमुग्ध भी कर सकते है| फिल्म का निर्देशन सराहनीय है और तारीफ के योग्य है|
विश्लेषण
कहानी की बात करे तो फिल्म अपने मुख्य विषय से हटते कही भी नझर नही आती| फिल्म के शुरुवाती संवाद थोडे सामान्य लग सकते है परंतु फिल्म में कई बार गंभीर दृश्यो में संवाद अपनी अलग जगह बनाने मी कामयाब होते दिखाई देते है| फिल्म में बारीक से बारीक डिटेलिंग पर काम किया गया है जैसे “मध्या” का उसको छोटा होने वाला स्कूल युनिफोर्म , उसका किरदार, उसके हाव भाव, मेकअप इत्यादि… फिल्म कि पटकथा पर भी संपूर्ण निष्ठा से काम किया गया है, यह फिल्म देखते समय स्पष्ट रूप से नझर आता है| फिल्म का छायांकन भी कई मामलो में सराहनिय है| सिनेमा समीक्षक की माने तो आपको यह फिल्म अवश्य देखनी ही चाहिए|


