Gulabo Sitabo Movie Review


Gulabo Sitabo | गुलाबो सिताबो

Gulabo Sitabo Movie Review | Amazon Prime

गुलाबो सीताबो शूजीत सिरकार द्वारा निर्देशित एक 2020 भारतीय हिंदी भाषिक फिल्म है| यह एक कॉमेडी-ड्रामा फिल्म है, जिसे रॉनी लहरी और शील कुमार द्वारा निर्मित किया गया है, यह फिल्म जूही चतुर्वेदी द्वारा लिखित है। कहानी लखनऊ में स्थापित एक हवेली और उससे जुडे विवादो पर आधारित है, इस फिल्म की कथा और पात्र पुरी तरह से काल्पनिक है| फिल्म में अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना के बिच की अनबन के चलते निर्माण होने वाले व्यंग को दर्शया गया है| COVID-19 महामारी के कारण, फिल्म सिनेमाघरो में रिलीज़ नहीं हुई थी, लेकिन 12 जून 2020 को अमेज़न प्राइम वीडियो पर दुनिया भर में रिलीज़ की गई थी।

आईए अब रुख करते है फिल्म की कहानी की तरफ…

टायटल : Gulabo Sitabo | गुलाबो सिताबो

निर्देशन : शूजीत सिरकार

निर्माता : रॉनी लहरी और शील कुमार

लेखन, पटकथा : जूही चतुर्वेदी

जेनर (शैली) : कॉमेडी-ड्रामा

कलाकार : किरदार

अमिताभ बच्चन : चुन्नन “मिर्ज़ा” (नवाब)

आयुष्मान खुराना : बांके रस्तोगी

विजय रजा : ज्ञानेश शुक्ला, सरकारी अधिकारी

बृजेन्द्र काला : क्रिस्टोफर क्लार्क (वकील)

फ़ारुख़ जफ़र : फ़ातीमा बेगम

सृष्टि श्रीवास्तव : गुड्डो

नलनेश नील : शेखू

टीना भाटिया : दुलहिन

मोहम्मद नौशाद : कठपुतली चलानेवाला

अर्चना शुक्ला : सुशीला

अनन्या द्विवेदी : नीतू

उजली राज : पायल

सुनील कुमार वर्मा : मिश्रा जी

आज़ाद मिश्रा : सैय्यद

उदय वीर सिंह यादव : मुन्ना सक्सेना

पूर्णिमा शर्मा : फौज़िया

शी प्रकाश बाजपेयी : पांडे जी

पूनम मिश्रा : मिश्राईन

जोगी मल्लंग : मुनमुन जी

त्रिलोचन कालरा : सिन्हा

बेहराम राणा : अब्दुल रहमान

जिया अहमद खान : डॉक्टर


कहानी

चुन्नन ‘मिर्ज़ा’ नवाब (अमिताभ बच्चन) एक कंजूस बूढ़ा व्यक्ति है जिसे ज्यादातर लोग लालची कंजूस के रूप में जानते हैं। उनकी पत्नी, फातिमा बेगम (फ़ारुख जाफ़र), जो उनसे 15 साल बड़ी हैं, वह फ़ातिमा महल की मालकिन हैं, जो लखनऊ की एक वर्षो पुरानी हवेली हैं, जिसके विभिन्न कमरे अलग-अलग किरायेदारों को बेहद मामूली राशि के भुगतान के बदले किराए पर दिए गए हैं, जिनमें से कई किराएदार वाजिब किराया नहीं दे पाते हैं । बेगम ने अपनी उम्र और बिमारी के चलते हवेली और किराएदारो की सारी ज़िम्मेदारी मिर्ज़ा के हातो सौंप दि है| लेकिन मिर्ज़ा इतने लालची स्वरूप का व्यक्ती है के वह अपनी बेगम के मृत्यू का इंतेझार भी नही कर पाते है|

बांके रस्तोगी (आयुष्मान खुराना) अपनी मां और तीन बहनों के साथ हवेली के एक गरीब किराएदार हैं। वह एक गेहूं मिल की दुकान पर काम करता है, और यद्यपि वह अपने जीवन की अधिकांश चीजों से खुश है, जिसमें उसके परिवारीक उसके रिश्ते भी शामिल हैं, वह बाकी किराएदारो के मुकाबले किराया भी बहुत कम देता है और कुछ महिनो से किराया जुटाने में असमर्थ है| और मिर्जा के साथ इसी बात को लेकर नोंकझोंक करने से बचता बचाता रहता है और हरबार भुगतान करने से बचने के लिए झूठे बहाने बनाता है| जिसके चलते मिर्ज़ा उसे आते जाते टोकने का एक भी मौका हात से जाने नही देता और बांके को परेशान करने के अलग अलग नुस्खे अपनाते है| जिसके कारण वह बकाया किराया देने पर मजबूर हो जाए जीससे कहानी में व्यंग निर्माण होता है| हर-बार की नोंकझोंक से बांके को चिढ़ होने लगती है और एक दिन गुस्से में, वह एक टॉयलेट की दीवार पर लात दे मारता है जीससे दिवार गिर जाती है, हलांकी बांके जानबूझ कर ऐसा नही करता है लेकिन ईस वाकये से मिर्जा नाराज हो जाता है, और बांके से दिवार की मरम्मत की दलील करता है, बांके किसी भी प्रकार का भुगतान या मरम्मत  करने से साफ साफ मना करता है| जिसकी वजह से मिर्झा बहुत नाराज होता है और बांके और उसके परिवार को को हर संभव तरीके से परेशानी में डालने की कोशिश करता है| उनकी नोंकझोंक पुलिस थाने तक पहूंच जाती है, वहा पुरातत्वविशेषग्य ज्ञानेश शुक्ला (विजय राज) अपने किसी काम से मौजूद होते है, उनका ध्यान इस मामले पर जाता है, और हवेली कानून के दायरे में आ जाती है| मिर्झा और बांके की नोंकझोंक अनजाने में हवेली पर बहुत बढी मुसिबत ओढ लेते है| 

पुरातत्व विशेषग्य ज्ञानेश शुक्ला के हवेली पे पहुंच जाने के पश्चात मिर्झा खतरे को तुरंत भांप लेता है, और मामले की गंभीरता को देख वकील के पास पहूच जाता है, जीससे वह हवेली पार आने वाले संकट को दूर कर कर सके, दुसरी ओर वकील को घर मी देख बांके अपने रहने कि चिंता में फस जाता आ जाता है, और अपने परिवार को और बाकी किरायेदारो को भी रहने के लिये घर मिले इस आशा में और ज्ञानेश शुक्ला जो के पुरातत्व विशेषग्य है उनकी बातो में आकर उनके साथ सहयोग कर हवेली को पुरातत्व घोषित करने में लाग जाता है| कहानी उस पडाव पाहूच जाती ही जहा सभी किरदार अपने अपने व्यक्तिगत रुची के मद्देनझर हवेली को बेचने एवं तथाकथित पुरातत्व विभाग को सौंपने पे उतारू हो जाते है, लेकीन कोई भी एक बार भी उस हवेली की असली मालकीन जो की मिर्झा कि पत्नी फातिमा बेगम है उनसे सलाह मशवरा नाही करता है| और फिर फिल्म के अंतिम चरण में कहानी कूच इस तरह करवट लेती है जो किसी को भी अपेक्षित नही होता| कहानी का अंत अपेक्षित या अनपेक्षित है इसपर हम भाष्य करना उचित नही समझते इसके लिए बेहतर यही होगा आप फिल्म को देखें| लेकीन फिल्म के अंत में अगर आप निर्देशक और लेखक के संदेश को समझ पाएं तो आप कही न कही अपने अंदर झांकने पर और सोचने पर अवश्य मजबूर हो जाएंगे अंत में आप या तो स्तब्ध हो जाएंगे या आपकी आंखे नम हो जाएंगी|


 निर्देशन

फिल्म की शुरवात से ही मिर्झा (अमिताभ बच्चन) के किरदार के अलग अलग पेहलुओ को दर्शाने कि निर्देशक और अभिनय के शहंशाह बिग बी कि कोशिश, पटकथा और संवाद अतंत्य सराहानीय है| चुन्नन ‘मिर्ज़ा’ नवाब के किरदार को विस्तृत रूप से समझने कि कोशिश करे तो यह सीधे तौर पर नवाब होने के बावजुद गरीब, लालची, उट पटांग हरकते करनेवाला और मूर्खता से भरा हुआ नझर आता है लेकीन अगर किरदार कि बारीकीयो को समझने कि कोशिश करें तो यह प्रथम दर्शनी लालची और मूर्ख तो लगता ही है साथ में इसके अंदर के इंसान को भी दिखाता है, उसके मूर्खता से भरे भोलेपण को भी फिल्म के शुरवाती दृश्यो में दिखाता है, साथ में उसके अंदर के सीधे मुद्दे पर बात करणे वाले इन्सान को भी दर्शाता जैसे “वह सरे राह ५०० गुना १२ का हिसाब हो जोडकर ख़ुशीसे छटपटा जना हो”, “वकील के सामने बिवी के मृत्यू का इंतेझार साफ साफ काबुल करना”, “अपने रीश्तेदारो से अपमानित होने पार भी उसे अपमान नं समझना”, “बांके के घर किराया लेणे जाणा और उसकी छोटी बहाण कि तबियत देखं सौम्य होकर वहासे वापस लौट आना”, “५ लाख कि बात सुनकर बौखला जाना” ये सभी दृश्य मिर्झा के अजीब मिझाझ को बयां करते है और उसमेसे व्यंग पैदा करते है बिग बी ने यह किरदार बडीही बखुबी से निभाया ही किरदार को निभाने का उनका समर्पण फिल्म में साफ दिखाई देता ही दुसरी ओर आयुशमान खुराना हमेशा कि तरह अपने किरदार में नार आए जीन्होने बांके के किरदार को सहजता ए निभाया है और बाकी सभी कलाकारो ने अच्छा प्रदर्शन किया है खासकर सृष्टि श्रीवास्तव जो गुड्डो के किरदार में नझर आ रही है उन्होने “विजय रजा” जो के ज्ञानेश शुक्ला, सरकारी अधिकारी पुरातत्व विशेषग्य के रूप में है और बृजेन्द्र काला जो के क्रिस्टोफर क्लार्क वकील के रूप में है इनके जैसे मंझे हुए कलाकारो के सामने दमदार प्रदर्शन किया है|

विश्लेषण

फिल्म को तकनिकी दृष्टी से देखें तो शुरवात के कुछ मिनिटो कें बाद फिल्म कि गती थोडीसी कम हो जाती है, और फिल्म दर्शको पर से अपनी पकड खोटे दिखाई देती है शूजीत सिरकार का निर्देशन अच्छा था पर दर्शको के लिहाज से देखें तो सटीकता और नएपण की कमी कही न कही नझर आती है| फिल्म कें कई दृश्यो को देखें तो पटकथा में अस्थिरता नझर आती है, जो कहानी की कडिया जोडने में पुरी तरह से सक्षम होते नही दिखाई देती| फिल्म के संवाद कहानी के हिसाब से बेहतरीन लगते है, और सभी कलाकारो ने बढीया अभिनय किया है खासकर अमिताभ बच्चन, सृष्टि श्रीवास्तव, फ़ारुख़ जफ़र हलांकी “विजय रजा” और “बृजेन्द्र काला” को अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिखाने का मौका मिलते दिखाई नही दिया, दोनो ने हमेशा कि भांती बडीही सहजता से अभिनय किया है| फ़ारुख़ जफ़र जो की फातिमा बेगम के रूप मी है वह छोटे छोटे दृश्यो के बीच अपने अभिनय से सटीक व्यंग निर्माण करने में काफी हद तक सफल होते दिखाई देती है| कुल मिलाकर कहानी के लिहाज से सोंचे तो आप यह फिल्म आप एक बार देख सकते है और अगर आप बिग बी के प्रशंसक है तो आप कितनी बार भी देखें आपको यह किरदार हद से झ्यादा पसंद आयेगा|

Gulabo Sitabo Movie Review | Amazon Prime

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ट्रेलर देखे…

Video Source : Amazon Prime India Official YouTube Channel

Gulabo Sitabo – Official Trailer | Amitabh Bachchan, Ayushmann Khurrana | Shoojit, Juhi | June 12


Ratings : 7.5/10

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